यहाँ दो अलग प्रश्न हैं, और दोनों को अलग-अलग समझना ही निरुक्त का practical use है।
प्रश्न 1: “छन्द शब्द का अर्थ क्या है / यह ऐसा क्यों कहलाता है?” → यह निरुक्त का प्रश्न है।
प्रश्न 2: “किसी मंत्र का छन्द कौन-सा है और उसकी मात्राएँ कैसे गिनी जाएँ?” → यह छन्दशास्त्र का प्रश्न है।
1. निरुक्त की दृष्टि से – छन्द शब्द क्यों बना?
निरुक्त शब्द की जड़ में जाता है।
शब्द: छन्दस् (छन्दः)
धातु: संस्कृत में इसे √छद् (chad) धातु से जोड़ा जाता है, जिसका अर्थ है ढकना / आच्छादित करना।
तो सवाल उठता है – छन्द को “ढकने वाला” क्यों कहा गया?
वैदिक व्याख्याओं में इसके दो भाव मिलते हैं:
- छन्द मंत्र के भाव को एक निश्चित लय में ढक कर / बांध कर रखता है, जैसे वस्त्र शरीर को ढकता है।
- दूसरा – छन्द पापों और दोषों को ढकता है / दूर करता है।
यही निरुक्तीय सोच है – सिर्फ यह नहीं कि शब्द का मतलब क्या है, बल्कि यह मतलब आया ही क्यों?
2. छन्दशास्त्र की दृष्टि से – छन्द बनता कैसे है?
अब जब निरुक्त ने शब्द का मूल बता दिया, तो छन्दशास्त्र उसकी technical body बनाता है।
वह बताता है कि मंत्र की संरचना क्या है – कितने पाद हैं, हर पाद में कितने अक्षर हैं, लघु-गुरु का pattern क्या है।
सबसे प्रसिद्ध उदाहरण – गायत्री छन्द:
3 पाद × 8 अक्षर = 24 अक्षर
- तत् सवितुर्वरेण्यं – 8 अक्षर
- भर्गो देवस्य धीमहि – 8 अक्षर
- धियो यो नः प्रचोदयात् – 8 अक्षर
ऐसे ही अनुष्टुप् (8×4=32), त्रिष्टुप् (11×4=44), जगती (12×4=48) आदि बनते हैं।
तो 6 वेदांगों को एक साथ ऐसे देखिए – ये 6 अलग subjects नहीं, बल्कि वेद को decode करने के 6 tools हैं:
- शिक्षा → इसे उच्चारित कैसे करूँ? (Pronunciation)
- व्याकरण → इसकी भाषिक संरचना क्या है? (Structure)
- निरुक्त → इसका अर्थ क्या है और यह अर्थ कहाँ से आया? (Meaning / Etymology)
- छन्द → इसकी लय / rhythm क्या है? (Meter)
- कल्प → इसका कर्म में प्रयोग कैसे हो? (Ritual Application)
- ज्योतिष → वह कर्म कब किया जाए? (Right Time)
जब आप छन्द को इस पूरे system में रखकर देखते हैं, तब समझ आता है कि छन्द वेद का पैर क्यों है – छन्दः पादौ तु वेदस्य। जैसे पैर के बिना शरीर में गति नहीं, वैसे ही छन्द के बिना मंत्र में गति, लय और स्मरण-शक्ति नहीं।
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